सतगुरु रविदास महाराज जी का सच्चा व्यापार और उनकी परीक्षा

 

सतगुरु रविदास महाराज जी का सच्चा व्यापार

हउ बनजारो राम को

सहज करउ ब्यापारु


 

सद्गुरु रविदास महाराज जी जब युवावस्था में पहुँच गए तो आप जी की सोच पहले से बहुत अधिक परिपक्व हो गई। आस-पास के समाज में फैली रूढ़िवादिता, असमानता, अशांति आदि को देखकर आप जी चिन्तन में डूबे रहते। मानवता के पुजारी सद्‌गुरु रविदास जी सदैव इसी सोच में रहते कि इस समाज में समता और स्वतन्त्रता कैसे लाई जा सके? सभी को प्रभु नाम की सच्ची कमाई से कैसे जोड़ा जा सके? मायावी जाल में से लोगों को कैसे निकाला जा सके? क्योंकि उस समय लोग अपने सच्चे मार्ग को भूल चुके थे। धर्म को एक व्यापार ना दिया हुआ था।

 


यदि कोई प्रभु के नाम की बात करता था, दुनिया की नश्वरता की बात करता तो धर्म के ठेकेदार उसे मूर्ख की संज्ञा देते और उसे कठोर दण्ड भी भुगतना पड़ता। गुरु जी ऐसा मार्ग निकालना चाहते थे जिससे लोगों की सोच में शांतिपूर्वक परिर्वतन लाया जा सके। आप जी के पिता श्री संतोख जी अपने इकलौते पुत्र को सोच में डूबे देखकर परेशान रहने लगे। मन में कई तरह के प्रश्न उठते थे।

 

पिता संतोख की चिन्ता बढ़ती गई। लोग क्या सोचेंगे? एक बेटा और वह भी बेकार, बिना कारोबार के। ऐसे इसका विवाह भी नहीं हो पाएगा।

 

दुनियां में रहकर इसे कोई तो कारोबार करना ही पड़ेगा। इसी सोच में डूबे हुए पिता संतोख एक दिन घर से बाहर निकले तो देखा कि एक खुले मैदान में बैठे कुछ व्यापारी अपने पैसों का हिसाब-किताब कर रहे थे। पहले समय में लोग दुकानों पर बैठ कर व्यापार नहीं किया करते थे और न ही बड़े-बड़े गोदाम हुआ करते थे। बल्कि व्यापारी लोग बैलों और घोड़ों में सामान लाद कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर सामान बेचने जाया करते थे। नगर-नगर, गाँव-गाँव में जाकर अपनी चीजें बेचते थे। इसी तरह के व्यापारियों का वह काफिला बनारस के पास एक खुले स्थान पर बैठकर पैसों का हिसाब कर रहा था। पैसों का ढेर देखकर पिता संतोख के मन में आया कि इन व्यापारियों के माँ-बाप कितने भाग्यशाली हैं जिन्होंने व्यापार करके इतना ज्यादा धन इक्टठा किया है। कितना अच्छा लगे अगर मेरा बेटा भी यह व्यापार करना सीख जाए और हमारे पास भी इतना धन हो जाए जिससे हमारी ग़रीबी कट जाए। घर पहुँचकर पिता ने पुत्र को समझाया, 'बेटा! अब मेरी बात ध्यान से सुनना। तुझे मैंने पढने के लिए भेजा था पर तुमने पढ़ाई नहीं की। अगर चमड़े के काम में लगाया तो भी तुझे काम करना नहीं आया। अब मैं तुम्हें जिस व्यापार के लिए कह रहा हूँ, उसे ध्यान से समझ और उस व्यापार में अपना मन लगा। अच्छा व्यापारी बनने से हमारे पास बहुत सारा धन एकत्र हो जाएगा।

 

सद्गुरु रविदास महाराज जी अपने पिता की बात सुनकर कहने लगे-'पिता जी! आप किस व्यापार की बात कर रहे हो। मैं तो जन्म से व्यापार करता आ रहा हूँ। मैंने तो काफी कमाई भी कर ली है। मुझे तो इस व्यापार में आज तक कभी घाटा भी नहीं पड़ा। उस प्रभु की अपार कृपा से मैं एक अच्छा व्यापारी बन गया हूँ, बेटे की बात सुनकर पिता संतोख दास को बहुत क्रोध आया, लेकिन गुस्सा पीकर कहने लगे कि एक तो कोई काम नहीं करता, ऊपर से झूठ बोलना भी सीख लिया? बोले, 'आप ने कौन सा व्यापार करना सीख लिया है? तुम्हारे पास कौन सा बैल है, जिस पर सौदा लाद कर तुम पहाडों पर जाते हो और कब किया यह व्यापार? तुम तो कभी घर से बाहर नहीं निकले और फिर कहाँ गई आप की कमाई?

 

उस समय सद्‌गुरु जी ने इस शब्द का उच्चारण करते हुए फरमायाः-

 

घट अवघट डूगर घणा।

इकु निरगुणु बैलु हमार । रमईए सिउ इक बेनती,

मेरी पूंजी राखु मुरारि । । १ । ।

को बनजारो राम को

मेरा टांडा लादिआ जाइ रे ।।१।। रहाउ ।।

हउ बनजारो राम को,

सहज करउ ब्यापारु

मै राम नाम धनु लादिआ,

बिखु लादी संसारि ।।२।। उरवार पार के दानीआ, लिखि लेहु आल पतालु ।

मोहि जम डंडु न लागई,

तजीले सरब जंजाल । । ३ । ।

जैसा रंग कसुंभ का तैसा इहु संसारु । मेरे रमईए रंगु मजीठ का

कहु रविदास चमार । । ४ । १ । ।

 

पिता जी! जो व्यापार मैं करता हूँ, उसके लिए मुझे न तो किसी बैल की ज़रूरत है, न किसी गाड़ी की, और न ही हमें किसी पहाड़ पर या किसी अन्य स्थान पर जाकर व्यापार करने की आवश्यकता है। मेरे पास व्यापार करने के लिए मेरा मन एक बैल है जो निर्गुण है और इसमें मैंने अपने श्वासों की पूंजी लाद रखी है और जिस पहाड़ में मैं जाता हूँ, वह पहाड़ बाहर नहीं है, बल्कि हमारी गर्दन के ऊपर वाला हिस्सा है। वह उलटे घड़े जैसा पहाड़ है। हमारे सिर की चोटी और दोनों आंखों के बीच एक ऐसा स्थान है, जहां अन्तर ध्यान लगाने से हम उस सौदागर के पास पहुँच जाते हैं, जो बिना भेदभाव के वहां पहुंचने वाले व्यापारी को नेक कमाई बख्शता है। पिता जी! आज तक मेरे इस व्यापार में मुझे कोई घाटा नहीं पड़ा और जो लोग अपने श्वासों की पूंजी को अपने मालिक को न सौंप कर व्यर्थ विकारों या चुगली-निंदा में लगा देते हैं, उनको न जाने हर रोज़ कितना घाटा पड़ता है, जिसे पूरा करने के लिए ही जीव को बार-बार जन्म लेना पड़ता है।

 

24 हज़ार दम खरच बन्दे दा,

आमदन मूल न थीवैं

जिस बंदे नूँ इतना घाटा,

उह बंदा किस विध जीवे ।।

 

सद्गुरु महाराज कबीर जी भी अपनी पवित्र वाणी में मानव के श्वासों की कीमत बताते हुए लिखते हैं:-

कहिता हूँ, कहि जाति हूँ,

काहु बजावत ढोल । सवासा बिरथा जाति है

तीन लोक का मोल ।।

 

सद्गुरु रविदास महाराज जी अपने पिता संतोख दास जी को अपने सच्चे व्यापार के बारे में बताते हुए कहते हैं कि हम राम नाम के बनजारे सहज भक्ति का व्यापार करते हैं। ऐसे नाम के बनजारे हैं जो व्यर्थ के दिखावे, कर्मकांडों और अंधविश्वासों में न पड़कर केवल उस मालिक के नाम की आराधना करते हैं और मैंने अपने इस निर्गुण बैल के ऊपर प्रभु नाम के धन का सौदा लादा हुआ है। उसी के नाम का व्यापार करता हूँ। प्रभु नाम को खरीदने की सलाह देता हूँ। यह जो संसारी जीव भौतिक वस्तुएं एवं ही बेचता हूँ। वही मेरी स्वयं की भी कमाई है और दूसरों को भी इसी सौदे विकारों की बिख का व्यापार करते हैं, यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं ।

 

मैं न तो ऐसा व्यापार करता हूँ और न ही अपने साथियों को करने की सलाह देता हूँ। जिन के पास प्रभु-नाम का धन होता है, जो ऐसा व्यापार कर लेते हैं, उनको र्मराज के चित्रगुप्त लिखारी को भी कह दिया है कि मुझे कभी भी यमदूतों जन्म-मरण का दंड नहीं भुगतना पड़ता। इसीलिए पिताजी! मैंने तो उस ६ की मार नहीं सहनी पड़ेगी। संसार में रहकर भी मैं इन संसारी विषय-विकारों मुक्त हूँ ।

 

इस संसार का रंग तो कुसुंभी फूल की तरह है जो अधिक समय तक नहीं टिकता । दुनिया के सभी रंग, धन, दौलत, औलाद की खुशियाँ, पद, इस संसार का रंग तो कुसुंभी फूल की तरह है, जो अधिक समय तक रविदास जी कहते हैं कि मेरे मालिक के नाम का रंग मजीठ का है जिसका मान-सम्मान आदि कच्चे रंग की तरह हैं। ये सदा रहने वाले नहीं। सद्गुरु पक्का रंग जिसे एक बार चढ़ जाता है, फिर वह कभी भी उतरता नहीं। उस मालिक के नाम के रंग के सामने दुनिया के अन्य सभी रंग फीके लगते हैं। इसीलिए पिता जी! आप चिंता मत कीजिए। आप का पुत्र भी एक बहुत बड़ा व्यापारी है। उसके व्यापार की पूंजी सदैव रहने वाली है।

 

राम-नाम का व्यापार ही सच्चा सौदा है, उसी के नाम का जाप ही सच्चा व्यापार है और यही पूंजी सदा रहने वाली है। अतः हम सभी को उस प्रभु के नाम की भक्ति करके अपने अमूल्य मानव-जन्म को प्रभु को समर्पित कर मोक्ष की प्राप्ति करनी चाहिए। पूरी बात को सुनकर पिता संतोख जी समझ गए कि मेरा बेटा सचमुच सच्चा सौदागर है। इस धन को न तो कोई चोर चुरा सकेगा और न ही यह खर्च करने से कम होगा, अतः यह व्यापार करने से मनुष्य का जन्म सफल हो जाता है। 



सतगुरु रविदास महाराज जी की परीक्षा

 

साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी। तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी ।।

 

"परीक्षा' शब्द का स्वरूप बहुत ही सीमित नज़र आता है लेकिन इस शब्द का अर्थ समुद्र की तरह विस्तृत एवं गहरा है और मानव जीवन के प्रत्येक क्षण में इसका प्रयोग जाने-अनजाने होता रहता है। परीक्षाओं का मानव जीवन से अटूट संबंध है। परीक्षाओं का मिश्रण ही मानव जीवन का सारांश है। समाज मानव की परीक्षा स्थली है जहाँ उसे अपने कार्यों द्वारा समाज की परीक्षाओं में सफल या असफल होना पड़ता है।

 

परीक्षा दो शब्दों के सुमेल से बना है :- पर+ईक्षा। "पर" का अर्थ है "दूसरा, "ईक्षा" का अर्थ है 'इच्छा'-दूसरों की इच्छा के अनुसार कार्य करना यदि मानव को किसी परीक्षा में से न गुज़रना पड़े तो यह मानव दानव का रूप धारण कर लेगा। विद्यार्थी को विद्यालय में परीक्षा देनी पड़ती है। नौकरी पाने के लिए भी कठिन परीक्षाओं में से गुज़रना पड़ता है। यह परीक्षाएं हमारी मेहनत, लगन और श्रम का मूल्यांकन करती हैं।

 

यदि व्यक्ति परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाता है तो उसे सफल घोषित कर किया जाता है। इसके विपरीत परीक्षा के अनुसार परिश्रम न करने वाला व्यक्ति असफल माना जाता है और वह अपने निर्धारित लक्ष्य को पाने में असमर्थ रहता है। ये सभी ऐसी औपचारिक परीक्षाएं हैं जिसे मानव ने सामाजिक शिक्षा का मूल्यांकन करने हेतु निर्धारित किया है। लेकिन जो व्यक्ति किसी विद्यालय में या किसी संस्था में नियमित रूप से कार्य नहीं करता या किसी डिगरी को प्राप्त करने वाली कक्षा में प्रवेश नहीं कर पाता, क्या उसे परीक्षा नहीं देनी पड़ती? क्या उसकी दिनचर्या का कोई पाठ्यक्रम नहीं होता? क्या उसके कार्यों का मूल्यांकन करने वाला कोई नहीं होता? क्या वह स्वेच्छा से ही जीता है?

 

नही! हम सभी को इन परीक्षाओं से भिन्न एक सर्वश्रेष्ठ परीक्षा देनी पड़ती है। वह परीक्षा है -मानव जीवन में आकर मानवीय कार्यों को करते हुए प्रभु भक्ति एवं गुरु-सेवा करना। वह परीक्षा हमारे आध्यात्मिक गुणों की होती है। जो व्यक्ति उस परीक्षा में खरा उतरता है, वही मोक्ष रूपी डिगरी प्राप्त कर जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा पा सकता है। अन्य सभी मानवीकृत परीक्षाएं उस प्राकृतिक परीक्षा का ही एक अंश मात्र हैं। जीव को परमात्मा ने सर्वश्रेष्ठ प्राणी बनाकर इस ससार में भेजा है ताकि वह परमार्थ और परमपिता परमेश्वर की भक्ति कर तन-मन-धन का सही प्रयोग कर सके, समाज का कल्याण कर सके। लेकिन समाज में आकर मानव जब अपने असली उद्देश्य से भटक कर नश्वर सांसारिक वस्तुओं की चकाचौंध को अपना सब कुछ समझ बैठता है और परम-शक्ति को भूलकर स्वयं को अन्नदाता समझ लेता है तो वह मानव जीवन रूपी परीक्षा में असफल हो जाता है। उसे संसार की चौरासी लाख जोनियों के नरक में से गुज़रना पड़ता है।

 

यह तो सामान्य मानव की बात है, पर जब सामाजिक अत्याचार बढ़ जाते हैं, अन्याय और अत्याचार का बोलबाला बहुत अधिक होने लगता है और ऐसा लगता है मानो पृथ्वी अन्याय के बोझ से असंतुलित हो रही है, तो फिर कोई न कोई महापुरुष इस धरती पर जन्म लेता है। मध्यकालीन युग में जब सद्गुरु रविदास महाराज जी को समाज में फैली अराजकता, सांप्रदायिकता, ऊँच-नीच, अधर्म आदि सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए संसार में भेजा गया तो आप जी ने बनारस की धरती पर जन्म लिया।

 

जैसे-जैसे आप बड़े होते गए, उनकी परीक्षाओं का दौर शुरु होता गया। भगवान ने सोचा कि जिन कर्मकांडों को दूर करने के लिए लोगों में प्यार और शांति के बीज बीजने के लिए सद्गुरु जी को मृत्यु-लोक में भेजा था, क्या गुरु जी के द्वारा वह उदेश्य पूर्ण हो रहा है या नहीं ? अपने धर्म को सद्गुरु ठीक ढंग से निभा भी रहे है या नहीं । कहीं ऐसा न हो कि वे भी सामाजिक मोह-माया में पड़कर अपने सब्र और संतोष के आभूषणों को उतार बैठे हों। इसी परीक्षा हेतु एक दिन भगवान एक साधु-संन्यासी के भेष में सद्गुरु जी की उस झोंपडी में आ पहुँचे।

 

जहाँ सद्गुरु जी अपना पैतृक व्यवसाय चमड़े का कार्य कर रहे थे। यौवन अवस्था को प्राप्त कर चुके सद्गुरु रविदास जी को अपने कार्य से बहुत लगाव था। कर्तव्य को निभाना ही आपका धर्म था। प्रत्येक श्वास के साथ प्रभु के नाम का सिमरन करना ही आपकी दिनचर्या थी। जब सन्यासी सद्गुरु जी के निवास स्थान में गरे तो सद्गुरु जी ने अन्य संतों की तरह उस सन्यासी को भी सम्मान सहित आसन दिया। जल-पान ग्रहण करने के बाद । 


सतगुरु रविदास महाराज जी को पारस मणि देते हुए साधु के रूप में स्वयं भगवान

 

सद्गुरु जी ने साधु से पूछा,

 

'मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?

 

तो साधु बोला

 

“मेरा यह जोड़ा टूट गया है, मैंने इसे गँठवाना है,  पर आप इसे गाँठने की क्या मज़दूरी लोगे?

 

रविदास महाराज जी कहने लगे

 

“चाहे कोई बड़ा हो या छोटा मैं सभी से जोड़े की मुरम्मत के लिए एक कसीरा ही लेता हूँ।“

 

महात्मा ने पूछा- रविदास जी!

 

“इस प्रकार जोड़े गांठ कर कितनी कमाई कर लेते हो? इतनी कम मज़दूरी लेने के कारण ही तो तुम गरीब हो। इसी कारण इतना अच्छा मकान भी नहीं है तुम्हारे पास। परिवार का गुज़ारा कैसे चलाते हो?

 

सद्गुरु रविदास जी कहने लगे,-

 

महात्मन्! इससे मैं अपने घर-परिवार का गुज़ारा अच्छी तरह चला लेता हूँ। संतोष और सब्र की कमाई मुझे आनन्द देती है और मैं आराम की ज़िन्दगी जीता हूँ। मुझे और क्या चाहिए?

 

संन्यासी बोला,

 

रविदास जी ! मुझे आपकी गरीबी पर दया आ रही है। मैं तुझे एक कसीरा नहीं पारस देता हूँ, जो बहुत कीमती है। जब तुझे ज़रूरत होगी तब इससे तुम सोना बना लेना। सोना बनाकर तुम बाज़ार में बेच कर अपनी ज़रूरत पूरी कर सकते हो, बढ़िया घर बना सकते हो, जिसमें शाही-जीवन व्यतीत कर सकते हो। यह कीमती पारस कहीं मुझ से गुम न हो जाए या कोई चोर इसे न चुरा ले, इसीलिए इसे संभाल कर तुम अपने पास रख लो। मैंने अभी कई तीथों की यात्रा करनी है।“

 

सद्गुरु रविदास कहने लगे-

'महात्मन्! यदि आप इस पारस को अपने पास रखने से डर रहे हो तो मुझे क्यों चिन्ता में डाल रहे हो? यदि आप ने इसे रखना ही है तो स्वयं ही झोंपड़ी में कोई ऐसा स्थान ढूंढ लीजिए, जहां यह पारस सुरक्षित रह सके और फिर स्वयं ही वहां से ले जाना। पर इसे यह पाहा ले जाना, दूसरों की अमानत को संभालना बहुत मुश्किल होता है। जलदी मुझ पर कृपा करनी, इस बोझ से मुझे शीघ्र ही मुक्त कर देना।

साधु-महात्मा ने उस कीमती पारस को झोंपड़ी में रख दिया और कहा

रविदास आप की भावना तो बहुत अच्छी है, परंतु जीवन में कुछ ऐसे अविरआ जाते हैं, जब व्यक्ति विवश होकर धन की तलाश में घूमता है, तो सयममुश्किल समय में इसका प्रयोग कर लेना।“

 

यह कहकर साधु यहाँ से चला गया। लम्बे समय के बाद जब वही साधु पुनः रविदास जी के निवास चलन पर आया तो सद्‌गुरु के रहन-सहन की पुरानी दशा देखकर हैरान रह साध् गया। वही संतोष, वही कर्तव्य, वही आदर-सम्मान, सारा कुछ सद्‌गुरु के शोर्य की गाथा कह रहा था । चेहरे पर कोई चिन्ता की रेखा न थी। साधु ने जल-पान ग्रहण करने के बाद सद्गुरु जी से पूछा कि आप को एक पारस दिया था।

सद्‌गुरु जी बोले-

'साधु जी! आपने जहाँ रखा था वहीं पर पड़ा होगा। अन्दर जाकर भी देख लीजिए, क्योंकि मैंने तो उसे देखा भी नहीं।“

 

जब साधु ने पारस को उसी स्थान में पाया जहां रख कर गया था तो वह प्रसन्नचित मुद्रा में सद्‌गुरु को गले से लगा कर बोले-

 

“रविदास ! तुम अपनी परीक्षा में सफल हुए। जिस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आप को इस पृथ्वीलोक में भेजा था, उसे पूर्ण कर आपने निःसन्देह सच्चे महापुरुष का उदाहरण प्रस्तुत किया है। “

 

जब सद्‌गुरु रविदास महाराज जी को यह पता चला कि साधु के रूप में स्वयं भगवान मेरे निवास स्थान में आए हैं तो आप जी ने प्रभु को अपनी बाहों में समेट लिया। भगवान अपने को छुड़ा रहे थे, लेकिन सद्‌गुरु ने उन्हें प्यार के बन्धन में इस प्रकार बाँध लिया कि अब प्रभु का छूटना मुश्किल हो गया। जब सच्चा प्रेमी अपने मालिक को अपना सब कुछ न्यौछावर कर देता है, उसके प्रेम में रंग जाता है, तो प्रभु भी उस सेवक के प्यार से छूट नहीं पाता। अचानक प्रभु अदृश्य हो गए। उस समय सद्‌गुरु रविदास जी कहने लगे कि प्रभु आप मेरी बाहों में से तो छूट गए हो लेकिन मेरे हृदय में से आप कभी नहीं जा सकते। मेरा रोम-रोम आपका है और सभी में आपका ही वास है। शरीर कट जाने पर भी आप मुझे अपने से अलग नहीं कर सकते।

 

भगवान बोले

“रविदास ! तेरी मेरे साथ कैसी प्रीति हैतुम मुझे कितना प्यार करते हो”

 

रविदास महाराज बोले –

 

“हे प्रभु! मेरी आपके संग अटूट प्रीत है । प्रत्येक अवस्था में मेरा आपके साथ सच्चा नाता है । में दुनिया के सारे बंधनों से मुक्त हूँ ।“

 

सद्गुरु रविदास महारज जी ने अपने सच्चे प्यार को इस शब्द के द्वारा प्रकट किया है :-

 

जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा ।

जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा ।।१।।

माधवे तुम न तोरहु तउ हम नही तोरहि ।

तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि । । १ । रहाउ ।।

जउ तुम दीवरा तउ हम बाती ।

जउ तुम तीरथ तउ हम जाती ।।२।।

साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी।

तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी ।।३।।

जह जह जाउ तहा तेरी सेवा ।

तुम सो ठाकुरु अउरु न देवा ।।४।।

तुमरे भजन कटहि जम फांसा ।।

भगति हेत गावै रविदासा ।। ५ ।।५।।

 

गुरु रविदास जी सृष्टि के जीव और अजीव के अटूट प्रेम की उदाहरण देकर अपने प्रभु-प्रेम को अटूट बताते हैं, प्रभु को सम्बोधन करते हैं कि हे प्रभु! अगर तुम सुन्दर और हरियावल वृक्षों से भरा पहाड़ हो तो मैं उस हरियाली और वृक्षों में पनप रहे तुम्हारे स्वरूप से मुग्ध होने वाला मोर हूँ जो आपके स्वरूप को देखकर नाच उठता है। अगर तुम चाँद हो तो मैं तेरे शीतल प्रेम भरे प्रकाश में आनंदित चकोरी हूँ। इसीलिए हे प्रभु! तुम मेरे से अपना प्रेम मत तोड़ना और मैं भी आप से प्रेम नहीं तोडूंगा। तुम से तोड़ कर फिर मैं किस से प्रेम करूँगा? हे प्रभु! अगर तुम दीपक हो तो मैं उस दीये की बाती हूँ और अगर तुम तीर्थ हो तो मैं उस तीर्थ का यात्री हूँ। मैं किसी भी प्रकार से तेरे प्रेम से दूर नहीं जा सकता।

 

हे प्रभु! मैं तो तेरे साथ सच्ची-सुच्ची प्रीति करता हूँ। तेरी प्रीति के कारण ही मैंने दुनिया के सभी विकारों से अपना नाता तोड़ लिया है। मैं माया के जाल में से निकल गया हूँ।

जिधर भी मैं जाऊँगा और जहाँ भी मैं जाऊँगा, हे प्रभु! यह तेरा सेवक तेरी ही सेवा में हाज़िर हो कर तेरे ही गुण गाएगा क्योंकि तुम सर्वव्यापक हो। तेरे जैसा इस सृष्टि में अन्य कोई भगवान या देवता नहीं है।

 

हे प्रभु! तेरे गुण गाने से मनुष्य यमराज के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। इसलिए, यह रविदास तेरी प्रेम-भक्ति की प्राप्ति के लिए, तेरी तारीफ-सलाह में लीन है। हे प्रभु! मुझे प्रेम-भक्ति की बख्शिश कीजिए।


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